गुड्डा-गुड़िया बनाकर कर रहीं हैं रोज़गार सृजन, हॉबी से बनाई अपनी पहचान

रांची, झारखंड की रहने वाली शोभा कुमारी करीब 12 वर्षों से गुड्डा-गुड़िया बनाने में जुटीं हैं. हालांकि वे बताती हैं कि गुड्डा-गुड़िया को जीवंत बनाने में केवल 12 साल की मेहनत नहीं है, क्योंकि गुड्डा-गुड़िया को बनाने में भी अनेक हूनर का समावेश है, जिसे उन्होंने भिन्न-भिन्न जगहों पर जाकर ग्रहण किया है.

कोटा में ज्वाइन किया वर्कशॉप

शोभा बताती हैं कि जब वे अपने बेटे को राजस्थान कोटा में पढ़ने के लिए छोड़ने गयीं थीं, उस वक्त उन्होंने गुड्डा-गुड़िया बनाने का एक वर्कशॉप ज्वाइन किया था. यह वर्कशॉप उनके आवास से बहुत दूर था. जिसके लिए उन्हें एक लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी ताकि वे वहां जाकर ट्रेनिंग ले सकें. ऐसे ही धीरे-धीरे उनकी लगन बढ़ती गयी, जिसके बाद उन्होंने अपने दिन का अधिकांश समय गुड्डा-गुड़िया में दिया क्योंकि कला को निखारने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति बेहद जरुरी होती है. इस बीच उन्होंने अपने घर को भी बखूबी संभाला ताकि कोटा में रहते हुए उनके बेटे को परेशानी ना महसूस हो. इस तरह उन्होंने फिर एक उदाहरण पेश किया कि महिलाएं हमेशा से अनेक जिम्मेदारियों को निभा लेती हैं.

Women from Jharkhand is empowering women through making dolls

अपनी संस्कृति से लगाव

कोटा से वापस आने के बाद उन्होंने गुड्डा-गुड़िया को सबसे पहले अपनी संस्कृति में रंगना शुरू किया क्योंकि उनका मानना है कि अपनी संस्कृति को पहचान दिलाने में जो खुशी है, वह सबसे अनमोल होती है. इसके अलावा वे बताती हैं कि उन्होंने पेंटिग, कपड़ा डिजाइन की ट्रेनिंग और साथ ही सिलाई-कढ़ाई सातवीं कक्षा से सीख रही हैं, जिसका समावेश उन्होंने गुड्डा-गुड़िया को बनाने में किया इसलिए वे कहतीं हैं कि गुड्डा-गुड़िया को रूप देने में उनकी अनेक सालों की मेहनत है. शोभा बतातीं हैं कि गुड्डा-गुड़िया को बनाने के लिए धैर्य बनाये रखना बेहद जरूरी होता है क्योंकि सभी काम बड़ी बारीकी से करना होता है.

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इको-फ्रेंडली गुड्डा-गुड़िया

शोभा आगे बताती हैं कि उन्होंने गुड्डा-गुड़िया को बनाने में जिन चीज़ों का इस्तेमाल करती हैं कि वे सब आसानी से मिलते हैं और इको-फ्रेंडली होते हैं. जिसमें लकड़ी का बुरादा, कपड़ा और मिट्टी की आवश्यकता होती है. मिट्टी से गुड्डा-गुड़िया के चेहरों को आकार दिया जाता है और लकड़ी से उनकी संरचना बनायी जाती है. वह बताती हैं कि हमारी टीम में केवल महिलाएं हैं, जिसमें लगभग 35-40 महिलाएं शामिल हैं.

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गुड्डा-गुड़िया में लगती है मेहनत

गुड्डा-गुड़िया की लंबाई चार इंच से लेकर पांच फीट तक रखी जाती है. लंबाई के अनुसार ही उनकी कीमत 50 रुपये से लेकर 5000 रुपये निर्धारित की गयी है क्योंकि गुड्डा-गुड़िया को बनाने में मेहनताना बहुत लगता है. इसी बीच शोभा बताती हैं कि उन्होंने चेहरे को मिट्टी से आकार देने की ट्रेनिंग कोलकाता के कृष्णापुरी से लिया है, जिसे सीखने के लिए उन्होंने अनेक कठिनाइयों का सामना किया था.

उनका मानना है कि अगर काम खुद की पसंद का हो तो 24 घंटों का समय भी कम लगता है. साथ ही अगर खुद के हूनर से अन्य महिलाओं को रोज़गार मिल जाता है, इससे बड़ी खुशी की बात उनके लिए नहीं होती है. शोभा को अपनी हॉबी के लिए 2013 में स्टेट अवार्ड से सम्मानित किया था. साथ ही उनका चयन नेशनल अवार्ड के लिए भी हुआ था. इसके साथ ही शोभा अपनी अन्य प्रतिभाओं के ज़रिये भी महिलाओं को रोज़गार देने का काम कर रही हैं, जिसमें बैग बनाना और आर्ट एंड क्राफ्ट के अन्य हूनर भी शामिल हैं.

News Desk

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