इस युवक ने 200 से ज्यादा भिखारियों को रोज़गार दिलाकर बनाया आत्मनिर्भर:जानिए पूरी कहानी

लॉकडाउन के दौरान अनेक लोगों के रोज़गार चले गए तथा अधिकांश लोग भीख मांगने पर मजबूर हो गए। बिहार (Bihar) के समस्तीपुर ज़िला मुख्यालय से लगभग 50 किलोमीटर दूर शाहपुर पटोरी गांव के रहने वाले सोनू भी इनमें से एक हैं। वह जब लॉकडाउन के दौरान हुई परेशानियों का जिक्र करते हैं, तब उनके आंखें भर जाती हैं। वह बताते हैं कि लॉकडाउन के शुरुआत में तो ज़्यादा दिक्कत नहीं हुई क्योंकि उस समय लोग खाना बांटते थे लेकिन एक महीने बाद पेट भरना मुश्किल होने लगा।

लॉकडाउन के दौरान हुई लाखों लोगों को परेशानी

लाखों की संख्या में जब लोग पलायन कर अपने घर पहुंचे तब उनकी समस्या खत्म नहीं हुई बल्कि और भी ज्यादा बढ़ गई। वहीं जो शहर में रुके थे, उनकी मुश्किलें भी कम नहीं थी। आज हम कुछ ऐसे लोगों की बात करेंगे, जिन्हें हालात ने भीख मांगने पर मजबूर कर दिया परंतु अब यह लोग भीख नहीं मांगते बल्कि खुद अपना रोज़गार चला रहे हैं। इनकी कहानी किसी भी व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करती है।

Sharad Patel help beggars
नुक्कड़ नाटक कर जागरूक करते हुए

सोनू बताते हैं अपनी मुसीबत

सोनू बताते हैं कि उनके लिए भीख मांगने के तीन महीने 30 साल के बराबर थे क्योंकि यह उनका काम नहीं है। सोनू एक गरीब परिवार से हैं। बचपन में ही उनके पिता की मौत हो गयी थी, तब भी कभी ऐसी हालत नहीं हुई कि उन्हें भीख मांगना पड़े परंतु कोरोना महामारी के दौरान पेट भरने के लिए उन्हें यह भी करना पड़ा। हालात ऐसे थे कि सड़क पर काम मांगने वालोें की संख्या इतनी ज़्यादा हो गई कि काम मिलना नामुमकिन लगता था।

सोनू ने खिलौनों के ठेले लगाए

20-25 साल पहले सोनू के पिता अपने परिवार समेत रोज़गार की तलाश में लखनऊ आ गये थे, परंतु साल 2001 में बीमारी की वजह से उनके पिता की मृत्यु हो गई। पिता की मौत के बाद घर के खर्चे की पूरी ज़िम्मेदारी सोनू के कंधों पर आ गयी। उनके परिवार में उनकी पांच बहने और उनकी मां हैं। सोनू का भार कम करने के लिए उनकी बहनें भी मजदूरी करती थीं। नम आँखों के साथ सोनू बताते हैं कि शरद भैया की मदद से जबसे वह (शेल्टर होम) आए हैं, तबसे उन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई। यहां रहना-खाना सब फ्री है और साथ ही एक महीने पहले भैया ने 10,000 रुपए देकर खिलौने की ठेलियां भी लगवा दी हैं। इससे सोनू रोज़ 200-300 रुपए की आमदनी कर रहे हैं।

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सोनू

शरद अब तक 225 लोगों को आत्मनिर्भर बनने का मौका दे चुके हैं

शरद पटेल, जिसने सोनू की मदद की वह पिछले तीन सालों में 225 और इस कोविड महामारी के दौरान 30 लोगों को छोटे-छोटे बिजनेस शुरु कराकर उन्हें आत्मनिर्भर बने का मौका दिए हैं। इनमें से कुछ किस्मत के मारे लोग हैं, एक तो ऐसे भी व्यक्ति हैं, जिसकी दुकान पर दबंगों ने कब्ज़ा कर लिया और पत्नी को मार डाला। एक वह भी था, जिसे कुष्ट रोग हो गया तब घरवालों ने उन्हें निकाल दिया। इन सबमें एक ऐसा भी था, जो नौकरी करने शहर आया था, ताकि परिवार को अच्छी जिंदगी दे सके, मगर यहां हालात ने हाथ में कटोरा पकड़ा दिया। ऐसे लोगों को शरद ने नई ज़िंदगी शुरू करने का मौका दिया।

शरद 200 से ज़्यादा लोगों का माइक्रो बिजनेस शुरू करवा चुके हैं

शरद बताते हैं कि वह पिछले सात सालों से इन भिक्षुकों के बीच काम कर रहे हैं। शुरुआत के तीन चार साल उन्होंने सरकार के साथ मिलकर काम किया परंतु जब उन्होंने देखा कि इसका कोई लाभ नहीं हो रहा तब उन्होंने व्यक्तिगत समाजसेवियों तथा कुछ संस्थाओं से मदद लेकर उन लोगों को आत्मनिर्भर बनाने का फैसला किया। शरद पिछले तीन साल में 200 से ज़्यादा लोगों को छोटे-छोटे माइक्रो बिजनेस की शुरूआत करवा चुके हैं तथा 209 लोगों को वह उनके अपनों से मिलवा चुके हैं। इसके अलावा इनके बच्चों को पढ़ाने के लिए शरद ने एक निःशुल्क पाठशाला खोल दी है। शरद का यह सफर आसान नहीं था क्योंकि जो व्यक्ति एक बार भीख मांगने लगते हैं, उन्हें भीख मांगना छुड़वाकर रोज़गार शुरु करने के लिए प्रेरित करना आसान काम नहीं है।

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शरद को माइक्रो बिजनेस शुरू करवाने में करनी पड़ती हैं कड़ी मेहनत

शरद बताते हैं कि रोज़ फील्ड में जाकर उन लोगों के साथ एक अलग रिश्ता बनाना पड़ता है। उन्हें भरोसे दिलाना पड़ता है। उसके बाद काउंसलिंग करनी पड़ती है, तब कहीं जाकर ये शेल्टर होम पर आते हैं। शरद एक बैच में 20-25 लोगों को एक साथ ले आते हैं। उसके बाद लगभग छह महीने की कड़ी मेहनत के बाद इनके व्यवहार में परिवर्तन लाकर कर इन्हें छोटे-छोटे माइक्रो बिजनेस शुरु करा पाते हैं। समाज कल्याण मंत्रालय ने लोकसभा में मार्च साल 2018 में एक सवाल के जवाब में भारत में भिखारियों की संख्या बताई गई। साल 2011 की जनगणना के अनुसार देश में कुल 4,13760 भिखारी हैं, जिनमें 2,21673 भिखारी पुरुष और 1,91997 महिलाएं हैं।

भिखारियों की संख्या

रिपोर्ट के अनुसार सबसे ज़्यादा भिखारी पश्चिम बंगाल में हैं। उसके बाद दूसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश और तीसरे नंबर पर बिहार हैं। भिखारियों की संख्या देखें तब पूर्वोत्तर के राज्य काफी अच्छी स्थिति में हैं। केंद्र शासित दमन और दीव में 22 भिखारी और लक्षद्वीप में सिर्फ 2 ही भिखारी हैं। अरुणाचल प्रदेश में 114, नगालैंड में 124, मिजोरम में सिर्फ 53 भिखारी ही हैं। सामाजिक कल्याण मंत्रालय की इस लिस्ट से यह तो पता चलता है कि पर्वतीय प्रदेशों में भिखारियों की संख्या काफी कम है। उत्तराखंड में 3320 भिखारी और हिमाचल प्रदेश में 809 भिखारी तो वही दिल्ली में 2187 भिखारी हैं।

धनीराम रैदास (Dhaniram Raidas)

सोनू झा के खिलौने की ठेलिया से कुछ दुर पर 53 वर्षीय धनीराम रैदास फटे कपड़ों की सिलाई करते हैं। वह बताते हैं कि पहले वह एक बड़े शोरूम में पर्दे और गद्दियों के कवर की सिलाई करते थे परंतु एक हादसे में उनके पैर टूट गए। जिसके वजह से अब वह बैसाखी से चलते हैं। मार्च में जब धनीराम का पैर ठीक हुआ तब फिर से काम करने आए परंतु उस समय कोरोना की चर्चा हो रही थी, जिसके चलते उन्हें काम पर नहीं रखा गया। काम ना होने के वजह से धनीराम के अपनों ने भी उनका साथ छोड़ दिया इसलिए उनका घर जाने का मन नहीं किया। चार-पांच महीने हनुमान सेतु मन्दिर पर भीख मांगकर कर उन्होंने अपना पेट भरा।

सोनू
धनीराम

शरद ने की धनीराम की मदद

धनीराम उन दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि उन्हें बहुत बार पुलिस की लाठियां भी खानी पड़ती थी। जब कोई खाना बांटने आता था तब बहुत छीना-झपटी होती थी, तब कहीं जाकर खाना मिल पाता था। धनीराम नम आंखों के साथ कहते हैं कि खाना क्या वह अपमान का घूंट पीते थे? पास की बगिया में पुलिस से भागकर बैठे रहते थे। उस समय की ज़िंदगी नरक से कम नहीं थी। डेढ़ दो महीने पहले शरद भैया ने सिलाई मशीन दिला दी है। रोड पर यहीं बैठकर सिलाई करता हूं, दिन के 100-50 रुपए आ जाते हैं, कभी इससे कम तो कभी ज़्यादा की भी आमदनी हो जाती है।

शरद 2 अक्टूबर 2014 से ‘भिक्षावृत्ति मुक्त अभियान’ चला रहे हैं

केवल सोनू और धनीराम ही नहीं बल्कि उनके तरह नगर निगम द्वारा संचालित ऐशबाग मील रोड पर बने एक शेल्टर होम में अभी भी ऐसे 22 लोग रह रहे हैं। ऐशबाग में चलने वाले दो शेल्टर होम बदलाव संस्था द्वारा संचालित किये जा रहे हैं। ऐसे बहुत से भिखारियों की ज़िंदगी बदलने वाले तीस वर्षीय शरद पटेल उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के हरदोई ज़िला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर माधवगंज ब्लॉक के मिर्जागंज गांव के निवासी हैं। शरद लखनऊ में 2 अक्टूबर 2014 से ‘भिक्षावृत्ति मुक्त अभियान’ चला रहे हैं। शरद ने 15 सितंबर 2015 को एक गैर सरकारी संस्था ‘बदलाव’ की नींव रखी, जो लखनऊ में भिखारियों के पुनर्वास पर काम कर रही हैं।

भीख मांगने वाले लोग आत्मनिर्भर बनना चाहते हैं

शरद ने एक रिसर्च में देखा की 3,000 भिक्षुकों में से 98% भिक्षुकों ने कहा कि अगर उन्हें मौका मिले तो वह भीख मांगना छोड़ देंगे। राजधानी लखनऊ में जो लोग भीख मांग रहे हैं, उनमें से 88% भिखारी उत्तर प्रदेश के जबकि 11% अन्य राज्यों से हैं। जो लोग भीख मांग रहे हैं उनमें से 31% लोग 15 साल से ज़्यादा समय भीख मांगने में गुजार चुके हैं। शरद अक्सर रास्तों पर भिखारियों से बात करते हुए नज़र आते हैं। शरद बताते हैं कि पहले भी यहां भिक्षुकों की संख्या कम नहीं थी लेकिन कोरोना के समय में यह संख्या और भी ज्यादा बढ़ गयी है। इस दौरान भीख मांगने वाले बच्चों की संख्या भी बहुत बढ़ गयी है।

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शरद कोरोना काल में 30 लोगों को रोज़गार से जोड़ चुके हैं

शरद केवल कोरोना में 30 लोगों को भीख मांगना छुड़वाकर उन्हें फिर से रोज़गार से जोड़ चुके हैं। इनमें से कोई सिलाई कर रहा है, कोई सब्जी बेच रहा है, तो कोई खिलौने की दुकान चला रहा है। शरद कहते हैं कि इनके व्यवहार परिवर्तन में समय तो बहुत लगता हैं क्योंकि भीख मांगते-मांगते ये नशे के आदी हो जाते हैं। शरद की यही कोशिश रहती है कि छह महीने में वह एक भिक्षुक को रोजगार से जोड़ दें। जब शरद ने साल 2005 में उत्तर प्रदेश भिक्षावृत्ति प्रतिषेध अधिनियम 1975 में भिक्षुकों के लिए क्या-क्या सुविधाएं हैं, यह जानने का प्रयास किया तो उन्हें पता चला की सात ज़िलों में आठ राजकीय प्रमाणित संस्था भिक्षुक गृह) का निर्माण कराया जा चुका है।

अजय कुमार (Ajay Kumar)

इन भिक्षुक गृहों में 18-60 वर्ष तक के भिक्षुकों को रहने खाने, स्वास्थ्य तथा रोज़गार परक प्रशिक्षण देने तथा शिक्षण की व्यवस्था भी की गई हैं। जिससे भिक्षुओं को मुख्य धारा से जोड़ा जाए और उन्हें रोज़गार मुहैया कराया जाए परंतु आश्चर्य की बात तो यह है कि इनमें एक भी भिखारी नहीं रहता है। इन भिक्षुक गृहों का सही क्रियान्वयन ही नहीं हैं। 35 वर्षीय अजय कुमार, जो कमर के निचले हिस्से से पूरी तरह से दिव्यांग हैं। उन्होंने ट्राई साइकिल में ही एक छोटी सी दुकान खोल ली है, जिसमें मास्क, चिप्स, कुरकरे, बिस्किट जैसे कई सामान मिलते हैं। अजय पिछले आठ नौ साल से लखनऊ में भीख मांग रहे थे। पैरों से चल ना पाने की वजह से लोग उन पर ज़्यादा तरस खाते थे। जिससे उन्हें दिन के हज़ार-डेढ़ हज़ार और कभी इससे भी ज़्यादा मिल जाता था।

देश में भिखारियों के आंकड़े

अजय पिछले दो-तीन महीने पहले ही इस शेल्टर होम पर आए हैं। वह बताते हैं कि शरद भैया ने अभी ये दुकान खुलवा दी है। दिव्यांग होने की वजह से यहां भी लोग तरस खा जाते हैं। दिन में हज़ार, पन्द्रह सौ, दो हज़ार तक की बिक्री हो जाती है। शरद बताते हैं कि 65% लोग नशे के आदी हैं, जिसमें 43% लोग तम्बाकू का सेवन करते हैं। 18% बीड़ी, सिगरेट, स्मैक जैसे नशा लेते हैं तो वही 19% भिक्षुक तम्बाकू, धूम्रपान और शराब तीनों प्रकार के नशों का सेवन करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार 38% भिक्षुक सड़क पर रात काटते हैं तो वही 31% भिक्षुकों के पास झोपड़ी हैं जबकि 18% कच्चे मकान और आठ फीसदी के पास पक्के घर हैं। शोध में 31% लोग गरीबी , 16% विकलांगता, 14% शारीरिक अक्षमता, 13% बेरोजगारी, 13% पारम्परिक वहीं तीन फीसदी लोग बीमारी की वजह से भीख मांगने को मजबूर पाए गए।

शरद के शोध पर आधारित आंकड़े

इसके अलावा भीख मांगने वालों में 38% भिक्षुक विवाहित हैं जबकि 23% अविवाहित। इनमें से 22% विदुर, 16% विधवाएं शामिल हैं। रिसर्च में यह भी पता चला कि 66% से अधिक भिक्षुक व्यस्क हैं, जिनकी उम्र 18-35 वर्ष के बीच हैं जबकि 28% भिक्षुक वृद्ध हैं, पांच प्रतिशत भिक्षुक 5-18 वर्ष के बीच के भी हैं। भीख मांगने वालों के संख्या में 71% पुरुष जबकि 27% महिलाएं हैं। इनके बीच अशिक्षा का संख्या बहुत ही ज़्यादा हैं, 67% बिना पढ़े-लिखे हैं, लगभग 7% भिक्षुक साक्षर हैं और 11% पांचवी तक और पांच प्रतिशत आठवीं तक पढ़े हैं। वही 4% दसवीं पास, 1% स्नातक होने के बावजूद भीख मांग रहे हैं। यह चौकाने वाले आंकड़े शरद के शोध पर आधारित हैं, गांव कनेक्शन इनकी पुष्टि नहीं करता।

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शरद आंकड़े इकठ्ठा करते हुए

शरद इस कार्य में सरकार से मदद चाहते हैं

शरद बताते हैं कि आमतौर पर हम भिखारियों के साथ कुछ ऐसा व्यवहार करते हैं। कभी बहुत दया आ गई तो उन्हें दूर से पैसे दे दिए, या खाना खिला दिया परंतु कभी यह नहीं सोचते की लंबे बाल, फटे और मैले कुचैले कपड़ों के पीछे जो आदमी होता हैं, वह भी हमारे और आपके जैसा ही होते हैं। शरद कहते हैं कि एक बार यह सवाल खुद से पूछे की वे भिखारी क्यों बनें? इससे आप की सोच बदल जाएगी। शरद की कड़ी मेहनत की बदौलत अब ये भिखारी हाथ नहीं फैलाते। ये अपने हाथों से काम करके अपना पेट भर रहे हैं। शरद कहते हैं कि अभी हमारे पास इतने पैसे तथा साधन नहीं है कि हम हर भिक्षुक की मदद कर सके परंतु अगर सरकार हमारी मदद करेगी तो हमें यह करने में आसानी होगी।

गूँज नाम की संस्था कर रही है शरद की मदद

अभी शरद की मदद दिल्ली की ‘गूँज’ नाम की संस्था कर रही है। जिसके सहयोग से शरद इस covid 19 काल में भी लोगों को रोजगार देने में सक्षम हो पाए हैं। शरद कहते हैं कि इनके रोज़गार में एक बार में जितना भी पैसा खर्च होता है, वह वन टाइम लगा देते हैं और फिर यह पैसा इनसे वापसी नहीं लेते हैं। शरद हर छह महीने पर दूसरा बैच ले आते हैं। जिन्हें वह आत्मनिर्भर बना कर रोज़गार देते हैं।

शरद पटेल का यह कार्य प्रशंसा योग्य है। हम आशा करते हैं कि वह भविष्य में भी ऐसे ही कार्य करते रहें।

News Desk

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