80 वर्षों से ‘लौंडा नाच’ की विरासत को चला रहे थे, अब भारत सरकार द्वारा पद्मश्री दिया गया

गणतंत्र दिवस के मौके पर गणमान्य लोगों को अलग-अलग क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने के लिए पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनमें से एक है रामचंद्र मांझी जो 80 वर्षों से लौंडा नाच की विरासत को आगे बढ़ाते आ रहे है।

रामचन्द्र मांझी एक लोक रंगमंच कलाकार है। आज के अधुनियक युग में सभ्यता और संस्कृति की तरफ लोगों का रुझान कम होते जा रहा है। बिहार के अनेकों लोग विभिन्न लोक कला के रूप में जाने जाते है और अपनी कला का भी प्रदर्शन करते है। वहीं रामचंद्र मांझी जैसे लोग हमारी विरासत को बचाने में इस कद्र मग्न है कि उम्र भी उन्हें थका नहीं सकती।

Ramachandra Manjhi

केंद्र सरकार द्वारा बिहार के रामचंद्र मांझी को मिला यह सम्मान हमारी लोक संस्कृति को संजोए रखने और उनके संघर्ष के लिए है, जो बिहार ही नहीं पूरे देश के लिए गर्व की बात है। इसके पहले रामचंद्र मांझी को 2017 में “संगीत नाटक अकादमी” पुरस्कार मिला था।

लौंडा नाच

नाच – एक ऐसा कला जो “नृत्य” के साथ भ्रमित होता है, यह बिहार के लोक रंगमंच का अभिन्न अंग है। यह नाच पारंपरिक रूप से अनुसूचित जाति समुदायों के सदस्यों द्वारा पुरुष कलाकारों के साथ प्रस्तुत किया जाता है, जो आमतौर पर “लौंडा नाच” के रूप में प्रचलित है।

Ramachandra Manjhi

रामचंद्र मांझी का परिचय

रामचंद्र मांझी बिहार के छपरा जिला के एक छोटे से गांव ताजपुर के रहने वाले है। उनका जन्म एक गरीब परिवार में हुआ, मात्र 12 वर्ष की उम्र से ही वे बिहार के प्रसिद्ध कलाकार भिखारी ठाकुर के नाच मंडली में काम करना शुरू किए। आज उनकी इस यात्रा को 80 वर्षों से अधिक हो चुके और अपने कला के माध्यम से एक अलग ही इतिहास रच दिए।

रामचंद्र मांझी द्वारा प्रस्तुत किए गए कुछ प्रमुख नाटक

रामचन्द्र मांझी अपने इस 80 वर्ष की नृत्य यात्रा में अनेकों प्रदर्शन किए जिनमें कुछ प्रमुख नाटक प्रस्तुति है – बिदेसिया, बेटी बेचवा और गरबघिचोर। ये सभी नाटक भिखारी ठाकुर द्वारा लिखे गए है। रामचंद्र मांझी जैसे कलाकार आज के युवा कलाकारों के लिए प्रेरणा है, उम्मीद है हमारे समाज में उभरते कलाकार हमारी संस्कृति को बरकरार रखेंगे।

News Desk

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