हरसुख भाई की तरह करिए खेती, तब खेती बनेगी फायदे का सौदा

खेती एक ऐसा व्यवसाय है, जिसमें नुकसान होने का रिस्क बहुत ज़्यादा होता है तथा इसमें अक्सर मुनाफ़े की तुलना में लागत भी ज़्यादा लगती है। जिस वजह से किसान खेती का मार्ग छोड़ अन्य तरीको से अपना रोज़गार चला रहे हैं परंतु ऐसा नहीं है कि इस व्यवसाय में केवल हानि ही है। बहुत से लोग अपनी सुझ-बुझ के जरिए भी अच्छी आमदनी कर रहे हैं। उनमें से एक हैं, हरसुख राणा भाई पटेल।

हरसुख राणा भाई पटेल (Harsukh Rana Bhai Patel) को जानिए

हरसुख राणा भाई पटेल, गुजरात (Gujarat) के राजकोट ज़िले के धोराजी गांव के रहने वाले हैं। जिस उम्र में लोगों का शरीर उनका साथ देना छोड़ने लगता है, उस उम्र में हरसुख भाई देश के अलग-अलग राज्यों में घूम कर औषधीय खेती के नए तरीके सीखते हैं और खुद उन्हें खेती में आजमाते भी हैं। साथ ही वह दूसरों को भी इसके गुण सिखाते हैं। हरसुख भाई देश के प्रगतिशील किसानों में से एक हैं।इसके लिए उन्हें तीन बार गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा सम्मानित भी किया गया है। हरसुख भाई ने यह साबित कर दिया कि खेती एक फायदे का व्यवसाय है।

Harsukh bhai patel farming

हरसुख भाई पिछले 17 सालों से कर रहे हैं खेती

60 साल के राणाभाई पटेल पिछले 17 सालों से एलोवेरा तथा दूसरी औषधीय फसलों की खेती कर रहे हैं। साल 2002 में सीमैप (Simap) के वैज्ञानिकों ने अहमदाबाद में ट्रेनिंग कार्यक्रम किया था, वहीं से हरसुख पटेल ने औषधीय फसलों की खेती की शुरुआत की। हरसुख भाई 45 एकड़ ज़मीन पर पामरोज, लेमनग्रास, मेंथा, तुलसी, खस, पचौली, सिट्रोला, नेपाली सतावर और अश्वगंधा जैसी औषधीय तथा सगंध पौधों की खेती करते हैं। वह अभी भी केन्द्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान (सीमैप) में प्रशिक्षण लेते हैं।

हरसुख भाई अन्य किसानों को भी देते हैं ट्रेनिंग

हरसुख भाई औषधीय पौधों के बाड़े में बताते है कि इन फसलों में सबसे अच्छी बात यह होती है कि इसे पशु नुकसान नहीं पहुंचा पाते हैं। साथ ही इसकी मार्केटिंग में भी परेशानी नहीं होती और इसकी अच्छी किमत भी मिलती है। गुजरात में सबसे पहले हरसुख भाई ने खेती की शुरुआत की परंतु अब बहुत से किसान खेती कर रहे हैं और उनके पास ही ट्रेनिंग लेने आते हैं। हरसुख भाई पटेल ने सभी फसलों के आसवन के लिए आसवन टैंक भी लगावाया हैं, यहां दूसरे किसान भी अपनी फसल लेकर आते हैं।

हरसुख भाई जुड़े रिलायंस कंपनी से

हरसुख भाई बताते हैं कि एलोवेरा की एक एकड़ खेती से वह आसानी से पांच-सात लाख रुपए की कमाई कर लेते हैं। जब पहली बार साल 2002 में गुजरात में इसकी खेती हुई तो खरीदार नहीं मिले। इसके बाद हरसुख भाई ने रिलायंस कंपनी से करार किया। राष्ट्रीय औषधीय पौधा बोर्ड बताते हैं कि भारत में कुल 17000-18000 प्रजातियों के पौधे हैं, जिनमें से 6000-7000 औषधीय उपयोग में लाए जाते हैं और आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी और होमियोपैथी दवाओं की चिकित्सा पद्धति में इनका प्रयोग किया जाता है।

Harsukh bhai patel farmer

हरसुख भाई अपनी प्रोडक्ट पतंजलि को सप्लाई करते हैं

औषधीय पौधे पारंपरिक औषधि के साथ-साथ हर्बल उद्योग के लिए एक प्रमुख संसाधन आधार हैं। यह बहुत से लोगों के लिए रोज़गार का भी जरिया बन चुका हैं। भारत में 80 से 90 बिलियन औषधीय पौधों का कारोबार होता है, जिसमें हर वर्ष लगभग 10 अरब रुपए की औषधीय पौधों का निर्यात होती है। हरसुख भाई बताते हैं कि वह शुरूआत में औषधीय पौधों की पत्तियां बेचते थे परंतु अब वह पल्प बेचते हैं। अब हरसुख भाई की रामदेव की पतंजलि से करार हैं और वहां से उन्हें रोज़ाना 5000 किलो पल्प का आर्डर मिलता है।

हरसुख भाई हो चुके हैं नरेन्द्र मोदी द्वारा सम्मानित

हरसुख भाई आगे बताते हैं कि किसान जागरूक बने और पत्तियों की जगह उसका पल्प निकालकर बेचें। पत्तियां जहां पांच-सात रुपए प्रति किलो बिकती हैं तो वहीं पल्प 20-30 रुपए में बिकता है। इससे किसानों को ज़्यादा लाभ होगा। हरसुख भाई ने इसी अकलमंदी से खेती की और वह तीन बार नरेन्द्र मोदी द्वारा सम्मानित हो चुके हैं। हरसुख भाई अपने कार्य से गुजरात के दूसरे किसानों के लिए मिसाल बन गए हैं।

News Desk

One thought on “हरसुख भाई की तरह करिए खेती, तब खेती बनेगी फायदे का सौदा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *