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Friday, June 24, 2022
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डॉ. मालविका अय्यर 13 साल की उम्र में एक हादसे का शिकार हुई, उन्हें अपने दोनों हाथ गंवाने पड़े,लेकिन मानी नहीं हार,किया ये बड़ा कारनामा

इंसान एक ऐसी शक्ति है जो किसी भी बाधा से पार पाने की शक्ति रखता है। वह अपने मन में अगर कुछ ठान ले तो उसे कर के रहता है।

आज हम आपको डॉ. मालविका अय्यर के बारे में बताएंगे जिन्होंने 13 साल की उम्र में एक हादसे का शिकार हो गई थी। जिसके कारण उन्हें अपने दोनों हाथ गंवाने पड़े। लेकिन मालविका जी ने कभी अपनी इस कमजोरी को खुद पर हावी होने नहीं दिया। उन्होंने डटकर पढ़ाई की और पीएचडी की पढ़ाई पूरी कर वो आज डॉ. मालिवका अय्यर के रूप में पहचानी जाती है। यही नहीं उनके कार्यों को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें नारी शक्ति के सम्मान से भी सम्मानित किया था। आइये जानते हैं उनके बारे में।

जिंदगी में बदलाव आया

तमिलनाडू के कुमबाकोनम में जन्मीं डॉ. मालविका अय्यर को शुरू से ही खेलना-कूदना पसंद था। उनका लालन-पालन बीकानेर में हुआ। मात्र 13 साल की उम्र में एक भयानक हादसे ने उनकी जिंदगी को पूरी तरह से बदल कर रख दिया। जब मालविका 13 साल की थीं तो उस समय बीकानेर में उनके घर के पास ही सरकारी गोला-बारूद का डिपो था। उन्हें इस बात की भनक नहीं थी कि उस वक़्त कुछ समय पहले ही उस डिपो में आग लगी थी, जिसकी वजह से कई विस्फोटक पदार्थ आसपास में बिखरे हुए थे। वह किसी काम से बाहर आई और अनजाने में वह एक ग्रेनेड उठा कर ले आई। जैसे ही वो कुछ समझ पाती, तब तक ग्रेनेड फट गया और मालविका बुरी तरह से घायल हो गई। उन्हें घायल अवस्था में अस्पताल में भर्ती कराया गया। लेकिन इस हादसे के कारण मालविका अय्यर को अपने दोनों हाथ गंवाने पड़े।

मालविका हार नहीं मानी

दोनों हाथों के अगले हिस्सों को गंवाने के बाद भी मालविका अय्यर ने हिम्मत नहीं हारी। सर्जरी करते हुए डॉक्टर ने एक गलती कर दी थी। स्टीचिंग करते समय उनके एक हाथ की हड्डी बाहर ही निकली रह गई। जब हाथ का वो हिस्सा अगर कहीं छू जाता तो मालविका को काफी दर्द होता। लेकिन उन्होंने अपनी जिंदगी में सकारात्मक पहलू को देखा और इसी हड्डी को अंगुली के तौर पर इस्तेमाल किया। इसी हाथ से उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की। उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में ऑनर्स की डिग्री ली। इसके बाद पीएचडी पूरी की। अपनी पूरी पीएचडी थीसिस उन्होंने खुद टाइप की।

स्पीकर बन पेश की मिसाल

पीएचडी की पढ़ाई पूरी करने के बाद मालविका अय्यर डॉक्टर बन गईं। उन्होंने अपने जज़्बे से लोगों के सामने एक अनूठी मिसाल पेश की। उन्होंने छोटी-छोटी चीजों में बड़ी-बड़ी खुशी को देखना शुरू किया। देखते ही देखते उनकी जिंदगी में बदलाव आना शुरू हो गया और वो तनाव में ना रहकर खुश रहने लगी। जिसके बाद डॉ. मालविका अय्यर ने अपनी पहचान एक मोटिवेशनल स्पीकर के रूप में बनाई। आज आलम यह है कि उनको लोग मोटिवेशनल स्पीच देने के लिए बुलाते हैं। डॉ. मालविका दिव्यांगों के लिए काम करने के अलावा सामाजिक सरोकारों में भी रूचि रखती हैं।

पुरस्कार से हो चुकी हैं सम्मानित

गरीब बच्चों की सहायता करने और लोगों को मोटिवेट करने के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जी ने डॉ. मालविका अय्यर को राष्ट्रपति भवन में आमंत्रित किया था। यही नहीं डॉ. मालविका अय्यर को 8 मार्च 2018 को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जी ने नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया था। डॉ. मालविका डिसएबिलिटी एक्टीविस्ट और वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ग्लोबल शेपर हैं। कई विदेशी संस्थाओं से उन्हें अपने यहां मोटिवेशनल स्पीच देने के लिए बुलाया जाता है।

आज वह नारी शक्ति की एक मिशाल हैं। उनकी जितनी तारीफ की जाए कम है।

Shubham Jha
Shubham वर्तमान में पटना विश्वविद्यालय (Patna University) में स्नात्तकोत्तर के छात्र हैं। पढ़ाई के साथ-साथ शुभम अपनी लेखनी के माध्यम से दुनिया में बदलाव लाने की ख्वाहिश रखते हैं। इसके अलावे शुभम कॉलेज के गैर-शैक्षणिक क्रियाकलापों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।
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