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Sunday, January 16, 2022
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ओडिशा के बिभू साहू का कमाल! चावल की बेकार भूसी को बना दिया ‘काला सोना’, अब लाखों में है कमाई

ज़िंदगी में कई कठिनाइयां आती हैं पर जो उन कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कर लेता है वही सिकंदर कहलाता है।

आज हम आपको बिभू साहू के बारे में बताएंगे जिन्होंने बेकार पड़ी चावल की भूसी से 20 लाख रूपये कमाकर सभी को आश्चर्यचकित कर दिया। आइए जानते हैं उनके बारे में।

बिभू साहू का परिचय

बिभू साहू

बिभू साहू ओडिशा के कालाहांडी के रहने वाले हैं। जहां हर साल करीब 50 लाख क्विंटल धान की खेती होती है क्योंकि कालाहांडी ओडिशा में चावल का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। यहाँ चावल का ट्रींटमेंट करने वाली दर्जनों पैरा ब्लोइंग कंपनियाँ हैं। जिससे बड़े पैमाने पर भूसी का उत्पादन होता है। बिभू साहू पेशे से एक शिक्षक है। लेकिन अपने धान का बिज़नेस करने के लिए उन्होंने अपनी नौकरी को भी छोड़ दिया था।

योजना के तहत काम किया

चावल के मिल का बिज़नेस करते समय बिभू ने देखा कि चावल के मिलों में काफी मात्रा में भूसी बनता है। जिसे अमूमन खुले में जला दिया जाता है। इसकी वजह से पर्यावरण को भी काफी नुकसान होता है और जिसका प्रभाव हमारे स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। इस समस्या को देखते हुए बिभू ने भूसी का एक उपाय निकाला। वो चावल को भूसी को स्टील कंपनियों को निर्यात करने लगे। जिससे उन्हें प्रतिवर्ष 20 लाख रुपये से अधिक की कमाई होने लगी।

बिभू ने नया तरकीब निकला

कालाहांडी में धान का सबसे ज्यादा उत्पादन होता है इसलिए यहां दर्जनों पैरा ब्लोइंग कंपनिया है। वो कहते हैं कि उनकी मिल में हर दिन करीब 3 टन भूसी का उत्पादन होता है। जिसे आमतौर पर ऐसे ही फेंक दिया जाता था। जिससे स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता था। जिसके बाद उन्होंने लोगों की बढ़ती शिकायतों को देख। इस पर रिसर्च करना शुरु किया। जिससे उन्हें पता चला कि चावल की भूसी का इस्तेमाल स्टील बिज़नेस में एक थर्मल इन्सुलेटर के रूप में किया जा सकता है। इसमें 85% सिलिका होती है। जिसका अच्छा प्रयोग हो सकता है।

लोगों ने रुचि दिखाई

बिभू साहू ने मिस्र के एक स्टील कंपनी का दौरा भी किया और एक सैंपल के साथ अपने प्रस्ताव को रखा। लोगों ने उनके इस प्रस्ताव पर खासी रूचि दिखाई लेकिन वो इस भूसी को पाउडर के रुप में चाहते थे। काफी विचार विमर्श के बाद बिभू साहू ने भूसी के पाउडर बनाने की बजाय उसे गोलियों के रुप में निर्यात करने का फैसला किया। शुरुआत में बिभू को काफी संघर्ष का सामना करना पड़ा क्योंकि उन्हें गोलियां बनाने नहीं आती है। उन्होंने कई विशेषज्ञों से बात भी की, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला।

बिभू ने हार नही मानी

एक पल को बिभू साहू ने हार भी मान ली थी। लेकिन उसी समय उनके एक स्टाफ ने उनसे कुछ लमय मांगा और अपने साथ चार लोगों को ले आया। जिनकी मदद से वो गोली बनाने में सफल हो पाए। पैलेट को सही आकार में बनाने के लिए उन्हें कुछ हफ्ते का समय लगा। उनके पेलेट 1 मिमी से 10 मिमी के आकार में थे। इसलिए समय का लगना आवश्यक था।

आज उनकी तारीफ हर जगह हो रही है। बिभू साहू आज लोगों के लिए प्रेरणा हैं।

Medha Pragati
मेधा बिहार की रहने वाली हैं। वो अपनी लेखनी के दम पर समाज में सकारात्मकता का माहौल बनाना चाहती हैं। उनके द्वारा लिखे गए पोस्ट हमारे अंदर नई ऊर्जा का संचार करती है।
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